वो हवा में कुछ दिवाली की पहली महक,
वो पूरा संमा जो याद दिलाता था दिवाली की,
वो ढेर से पटाखे खरीदके रोज़ कुछ बजाना,
वो भर पेट मिठाई खाना और थक के सो जाना,

दीये और मोम्बतियों से घर का चमकना,
दोस्तों के घर जाना और उनका हमारे घर आना,

बहुत याद आती है वो बचपन की दिवाली!

वो रूठना मनाना और हँसना हसाना,
वो माँ के हाथों के खाने का स्वाद,
वो बाबा के संग पटाखे लेने जाना,
वो रंगोली बनाना और घर को सजाना,

वो नए कपड़े खरीदना और पहन कर इतराना,
वो पूजा ख़तम होते ही पटाखे बजने का इंतज़ार करना,

बहुत याद आती है वो बचपन की दिवाली!

वो चकरी जला के उस पे कूदना,
और अनार जला के ताली बजाना,
फूलझड़ी के जल्दी न जलने पर गुस्सा हो जाना,
वो दिवाली की यादें बहुत ख़ास हैं ,

क्योंकि बहुत याद आती है वो बचपन की दिवाली!

Linking it to Indispire Write a post on 0 (Zero). Write anything- humour, short story, haiku, poem, or a memory.

As without our family, friends and without our memories we are all Zero. So, thinking of all the good old times and looking forward to more wonderful memories with no zeroes.

And this is my 101th post on my blog! #celebrating 100 posts.

 

This post is for Day 28 of UBC and Daily Chatter

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